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ITF violence free workplaces 4 women

आईएलओ हिंसा और उत्पीड़न कन्वेंशन और कोविड-19 संकट

C190 – हिंसा और उत्पीड़न समझौता वायदा करता है कि वैश्विक कार्यस्थल हिंसा और उत्पीड़न मुक्त होंगे और यह समझौता 21 जून 2019 को आईएलओ शताब्दी वर्ष के दौरान अस्तित्व में आया। यह कन्वेंशन तब जीता गया था जब हमें नहीं पता था कि हम COVID 19 के संकट में घिरेंगे, स्वास्थ्य और आर्थिक संकट हमारे कार्यस्थल की दुनिया को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। इस महामारी ने कार्यस्थल में पहले से मौजूद भेदभाव और हिंसा को और तीव्र कर दिया है। अधिकारहीन, अल्पसंख्यक और अनौपचारिक तथा प्रवासी श्रमिकों जैसे कमजोर समूहों को वायरस के प्रतिकूल प्रभाव का सामना करना पड़ रहा है, जो इस समावेशी समझौते के माध्यम से कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण साधन बना रहा है।

आईएलओ कन्वेंशन 190 सभी श्रमिकों के लिए कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न को संबोधित करता है जिसमें लिंग आधारित हिंसा भी शामिल है।

कन्वेंशन 190, इस संकट के दौरान और उसके बाद भी, हिंसा और उत्पीड़न के खिलाफ सभी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा और बढ़ावा देने का एक साधन है जिसमें लिंग आधारित हिंसा भी शामिल है।

कन्वेंशन 190 सभी क्षेत्रों पर लागू होता है, चाहे वह निजी हो या सार्वजनिक, औपचारिक और अनौपचारिक दोनों तरह की अर्थव्यवस्था में, और चाहे शहरी या ग्रामीण क्षेत्रों में। (अनुच्छेद 2)

हालाँकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि महिला कर्मचारी – जो अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में अधिक प्रतिनिधित्व करती हैं, काम की अनिश्चितता और जोखिम से झूझती है, विशेष रूप से परिवहन जैसे पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में – उन्हें महामारी के विशिष्ट और अतिरिक्त प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है। वे अक्सर ग्राहक-सामना करने वाली भूमिकाओं में अग्रिम पंक्ति में काम कर रही हैं जैसे  टिकट विक्रेता, केबिन क्रू, सफाई कर्मचारी, संवाहक और हवाई अड्डे पर श्रमिक, जो कि महामारी के दौरान हिंसा, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभावों में हो रही वृद्धि की चपेट में हैं।

कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न

घरेलू हिंसा की घटनाओं और रिपोर्ट में वैश्विक उछाल आया है। लॉकडाउन के कारण कईं देशों के भौतिक कार्यस्थल पर रातों-रात परिवर्तन आया है, इसी वजह से बहुत से लोग अपने अत्याचारी के साथ घर पर रहने के लिए विवश हो गए हैं। 

महामारी के दौरान घरेलू हिंसा में नाटकीय वृद्धि के कारण को संबोधित करते हुए, डीवी@वर्क नेटवर्क से बार्ब मैकक्वेरी कहते हैं कि  ‘अलगाव पहले से ही घरेलू हिंसा की एक स्थापित रणनीति है जो  महामारी के सन्दर्भ से बाहर है।

हाल ही में भारत में परिवहन यूनियन संघों के नेतृत्व में राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, जिसमें 15,561 लोगों ने घरेलू हिंसा के अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए, एक प्रतिक्रिया जो बार बार गूँज रही थी ‘मेरा कार्यस्थल ही एकमात्र स्थान था, जिसने मुझे सयमित रखा और जब मैंने  घरेलू हिंसा का सामना किया तो मुझे सामना करने में मदद मिली।

आईएलओ कन्वेंशन 190 घरेलू हिंसा को कार्यस्थल के मुद्दे के रूप में मान्यता देता है, और बताता है कि नियोक्ता, सरकारें और यूनियन को कार्यस्थल में घरेलू हिंसा के प्रभावों को पहचानना और कम करने के लिए उचित उपायों को कार्यरत्त करना चाहिए। (C190 प्रस्ताव, अनुच्छेद 10 (एफ), सिफारिश सिद्धांत, III (18)।

डीवी@वर्क नेटवर्क वेबसाइट पर, महामारी के दौरान घरेलू हिंसा के लिए कमजोर श्रमिकों को नियोक्ता कैसे समर्थन दे सकते हैं – यहां पढ़ें

कार्यस्थल पर हिंसा का खतरा बढ़ा पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पहले से ही कम था और इस महामारी के दौरान  महिलाएं अपने कार्यस्थल में ज्यादा अलगाव महसूस कर रही हैं। इसके प्रमुख कारण – अस्थायी या स्थायी कर्मचारियों की भागीदारी में भारी कमी या/और  सीमा बंद होने के कारण लाखों श्रमिक फंस गए हैं। 

उदाहरण के लिए – महिलाओं सहित 200,000 से अधिक समुद्री नाविक, जिन्होंने दुनिया के जहाजों पर सवार अपने अनुबंध समाप्त कर लिए हैं और वे घर जाना चाहते हैं। परन्तु कोविड-19 महामारी के दौरान सरकारी प्रतिबंधों के चलते यात्रा और पारगमन पर रोक की वजह से वह घर नहीं पहुँच सके। संकट के समय में इस अलगाव ने महिलाओं के लिए कार्यस्थल में हिंसा का जोखिम बहुत बढ़ा दिया है। 

बढ़ते जोखिम के साथ, वायरस के संक्रमण का खतरा झेलते हैं शहरी परिवहन में ग्राहक-सामना करने वाले कर्मचारी। अश्वेत, प्रवासी या विकलांग महिलाएं परस्पर विरोधी प्रभाव का शिकार होती हैं, एक घातक उदाहरण तब हुआ जब लंदन में अश्वेत महिला रेलकर्मी की मौत हो गई जब काम  के दौरान एक व्यक्ति ने उन पर थूका और कहा कि वह वायरस से संक्रमित है ।

आईएलओ कन्वेंशन 190 कार्यस्थल में हिंसा और उत्पीड़न पर लागू होता है, और लागू होता है उन कार्यों में जो काम के साथ जुड़े हों या काम से ही उत्पन्न हों। इसमें  नियोक्ता द्वारा प्रदान आवास एवं आवागमन शामिल है। अनुच्छेद 3 (ए), (ई), (एफ), कार्यस्थल संकट को हिंसा और उत्पीड़न के ढांचे में संबोधित करने के लिए कर्मचारियों को  सुसज्जित करता है।

आपकी कर्यस्थल की दुनिया हर दिन नए सिरे से परिभाषित हो रही है।

कार्य संबंधित संचारसूचना और संचार प्रौद्योगिकियों के माध्यम से जो पहले ही कार्यस्थल का हिस्सा है – इसका उपयोग महामारी के कारण बढ़ गया है। ऑनलाइन मीटिंग, डिजिटलाइजेशन / ई-ऑफिस सहित काम करने के तरीकों में तेजी से बदलाव आया है, और साथ ही महामारी के दौरान दूरस्थ कार्य करने में चुनौतियों  का सामना और अनुकूल होना। साइबर (ऑनलाइन ) दादागिरी  और ट्रोलिंग ( किसी को परेशान करने या उनसे गुस्सा प्रतिक्रिया प्राप्त करने के उद्देश्य से एक जानबूझकर अपमानजनक या उत्तेजक ऑनलाइन पोस्ट ) सहित काम करने के इन नए तरीकों से उत्पीड़न और हिंसा का खतरा बढ़ गया है।

C190 में काम के दौरान होने वाली कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न शामिल है, और कोई भी काम जो कार्यस्थल की कार्यप्रणाली  के साथ जुड़ा हुआ है या उत्पन्न होता है जैसे कार्य सम्बंधित संचार, सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों की प्रणाली; (कन्वेंशन 190, अनुच्छेद 3 डी )

व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा परिवहन उद्योग के लिंग-पृथक प्रकृति के परिणामस्वरूप,  महिलाओं की संख्या इस महामारी में ग्राहक-सामना और सफाई कार्यों में अधिक है, फलतः संक्रमण और मनोवैज्ञानिक प्रभावों का बढ़ा हुआ जोखिम। इसमें अपर्याप्त और उचित व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) की कमी के साथ, जोखिम बढ़ गया है, और ग्राहक की चिंताओं, कार्यस्थल पर घातक जोखिमों के अनुभवों को संसाधित करने के लिए कोई मनोवैज्ञानिक समर्थन मौजूद नहीं है, परिवार के लिए जोखिम के कारण घर पर बढ़ा तनाव, अस्थायी कर्मचारियों में ज़्यादा महिलाओं का बहुमत, इसका मतलब यह है कि महिला परिवहन कर्मचारी कोरोनोवायरस संकट के नकारात्मक प्रभावों को ज्यादा और भुगत रही हैं।

“हमें पीपीई किट का आभाव है और वायरस घर ले जाने से डर लगता है, इसलिए हम अपने बच्चों को हमसे दूर रखने की कोशिश करते हैं। इन चुनौतियों के साथ भी, हम सभी के लिए स्वच्छता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में गर्व महसूस करते हैं। ” – रेलवे कर्मचारी, भारत

कन्वेंशन C190 हिंसा और उत्पीड़न और सम्बंधित मानसिक-सामाजिक जोखिमों को स्वास्थ्य और सुरक्षा जोखिम के रूप में मान्यता देता है और बताता है कि प्रतिनिधि नियोक्ताओं और श्रमिक संगठनों के परामर्श से सरकारों द्वारा कदम उठाए जाने चाहिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि हिंसा और उत्पीड़न प्रासंगिक राष्ट्रीय नीतियों में एकीकृत हो, जिसमें मौजूदा व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य उपायों का विस्तार या अनुकूलन हो। (कन्वेंशन 190 – अनुच्छेद 9,11,12)

महिला कर्मचारियों की दृश्यता और कोविड-19 प्रतिक्रिया में उनका शामिल होना

जैसा कि हम जानते हैं कि कोविड-19  का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा और सबसे कमजोर समुदाय पहले प्रभावित होंगे, ऐसे समुदाय ही सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं।

लिंग और पुरुष-प्रधान उद्योग, जिसमें ट्रांसपोर्ट शामिल है, प्रोफेसर टेसा राइट द्वारा शोध के चलते, हम जानते हैं कि महिला कर्मचारियों की स्थिति में सुधार की रणनीति तब सफल होती है, जब सकारात्मक लिंग कार्यवाही मुख्य परियोजना उद्देश्यों और उचित परिश्रम का हिस्सा बनती है, सार्वजनिक वित्त से जुड़े विशेष अवसर और निजी वित्त का इस्तेमाल सार्वजनिक अवसंरचना और सेवा वितरण के लिए हो।

जैसा कि हम महामारी से अपना मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं, सरकारों के पास अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में आवश्यक जिम्मेदारी होती है। सार्वजनिक और निजी पूँजी के माध्यम से पर्याप्त आर्थिक प्रोत्साहन के साथ, यह महत्वपूर्ण है कि लैंगिक न्याय मुख्य निवेश मानदंडों के भीतर समावेशित हो।  राहत राशि, आर्थिक नीतियों, बेरोजगारी के लाभों को लैंगिक दृष्टि के माध्यम से समझने की आवश्यकता है ताकि इसे वास्तव में समावेशी बनाया जा सके। इस प्रकार यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि लैंगिक नजरिया कोविड-19 प्रतिक्रिया में इस्तेमाल हो जिसमें लिंग प्रभाव आकलन भी शामिल हो।

सिफारिश संख्या 206 डेटा के महत्व को पहचानती है और राष्ट्रों से आह्वान करती है कि वह आंकड़ों को एकत्रित और प्रकाशित करने के लिए प्रयास करे, यह आंकड़े लिंग आधार तथा हिंसा के विभिन्न रूपों और उत्पीड़न का ब्यौरा लिए हों, आर्थिक गतिविधि का क्षेत्र, साथ ही समुदायों की विशेस्ताएं जो  नाज़ुक परिस्थितियों के दौरान प्रकट होती हैं। कार्यस्थल में हिंसा और उत्पीड़न को रोकने और संबोधित करने के लिए नीति प्रतिक्रियाओं की सूचना देना और निगरानी रखना आवश्यक है।

(पैरा. 22 R206)

कन्वेंशन 190 पथ प्रदर्शित करता है एक उचित, सुरक्षित कार्य वातावरण के लिए, सभी कर्मचारियों के लिए समानता, जो व्यवसायों की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है जैसा कि आईएलओ ने प्रकाश डालते हुए कहा है  ‘हिंसा और उत्पीड़न के साथ नहीं जमती स्थायी उद्योगों की तरक्की तथा काम के संगठन, कार्यस्थल संबंध, कर्मचारी जुड़ाव, प्रतिष्ठा और उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।’ (कन्वेंशन 190 प्रस्तावना)। इसलिए  यह कन्वेंशन वैश्विक अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए केंद्रीय है। 

महिला परिवहन कर्मचारियों के अधिकारों और कोविड-19 के लिए आईटीएफ की मांग के बारे में और जानें

आईटीयूसी ने कई पाठन सामग्रियों का निर्माण किया है:

  • सोशल मीडिया के लिए ग्राफिक्स और GIFs
  • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
  • C190 के लिए कुंजी (मिनी गाइड)
  • सरकारी प्रचार और पैरवी के लिए नमूना पत्र

सभी पाठन सामग्री यहाँ उपलब्ध हैं:

https://www.ituc-csi.org/GBV

आईटीएफ C190 अभियान के बारे में अधिक जानने के लिए, अपने संघ या सरकार द्वारा अनुसमर्थन कार्रवाई के बारे में जानकारी साझा करने के लिए, या इसमें शामिल होने के लिए, हमें यहां लिखें women@itf.org.uk 

हिंसा र उत्पीडन सम्बन्धि आईएलओ महासन्धि र कोभीड-१९ को संकट

हिंसा र उत्पीडनबाट मुक्त कार्यस्थलको वाचा गर्ने सी१९०हिंसा र उत्पीडन सम्बन्धि महासन्धि को घोषणा आषाढ ६, २०७६ मा आईएलओको शताब्दि महोत्सवको  दौरानमा भएको हो।  .

कोभीड-१९ मा पनि हामीले जीवन बिताउन पर्नेछ भनेर थाहा नहुने अवस्थामा, यस महासन्धिको घोषणा गरिएको थियो-  हाम्रो कार्यस्थललाई गम्भिर असर पार्ने यो एउटा स्वास्थ्य एवं आर्थिक संकट हो । कार्यस्थलमा पहिले देखि रहिआएको विभेद एवं हिंसालाई, यस महामारीले अझै बढाएको छ। अनौपचारीक क्षेत्र एवं आप्रवासी कामदारहरुमध्येका सीमान्तकृत, अल्पमतमा परेका लगायत जोखिम उन्मुख समूहहरुले, यस भाईरसको कारणले गर्दा असमानुपातिक असरहरु भोगीरहेका छन्। त्यसैले यो समावेशी महासन्धि, श्रमिकहरुको अधिकार संरक्षण गर्नको निम्ति एउटा महत्वपूर्ण आधार बनेको छ। 

आईएलओ महासन्धि १९० ले कार्यस्थलमा समस्त श्रमिकहरुसँग सम्बन्धित लैङ्गिक हिंसा लगायत अन्य हिंसा एवं उत्पीडनलाई सम्बोधन गर्छ। 

संकटको दौरानमा र पछि पनि, श्रमिकहरुसँग सम्बन्धित लैङ्गिक हिंसा लगायत अन्य हिंसा र उत्पीडन बिरुद्धको अधिकारहरुलाई संरक्षण एवं प्रवर्धन गर्ने एउटा आधार महासन्धि १९० हो।

महासन्धि १९० सबै क्षेत्रहरुमा लागु हुन्छ, चाहे नीजि होस् वा सार्वजनिक, औपचारीक र अनौपचारीक अर्थतन्त्र, र शहरी होस् वा ग्रामीण क्षेत्र। (धारा २)

यति भन्दै गर्दा, औपचारीक अर्थतन्त्र, कठीन कार्य, र विशेष गरी यातायात जस्तो पुरुष हावी भएको क्षेत्रहरुमा, लैङ्गिक विभाजनबाट संचालित भूमिकाहरुमा अत्याधिक प्रतिनिधित्व गरेका महिला मजदुरहरुले, महामारीको अन्य विशेष असरहरु भोगीरहेका छन्। उनीहरु प्राय अग्रपङ्क्तिमा रही, टीकट बिक्रेता, क्याबीन क्रयू, सफाकर्मी, खलासी र विमानस्थलका कामदारहरु जस्ता ग्राहकको सम्पर्कमा आउनुपर्ने भूमिका निर्वाह गरीरहेका छन्। यस कारणले उनीहरु महामारीको दौरानमा थप हिंसा, लगायत स्वास्थ्य र आर्थिक असरहरुको जोखिममा छन्। 

कार्यस्थलमा हिंसा र उत्पीडन

 घरेलु हिंसाका घटनाहरु र तिनको प्रतिवेदनमा विश्वव्यापी रुपमा वृद्धि भएको छ। यस्तो हुनुको एउटा कारण भनेको, विभिन्न देशहरु पूर्ण बन्दाबन्दीमा हुनाले/भइरहनाले रातारात भौतिक कार्यस्थलमा आएको परिवर्तन हो, जसको कारणले थुप्रै पीडितहरु पीडकसँग आफ्ना घरहरुमा एक्लो बनेर बस्नु परेको छ।

महामारीको कारणले घरेलु हिंसामा भएको अत्याधिक वृद्धिलाई सम्बोधन गर्दै, डीभी@वर्क नेटवर्क (कार्यस्थलमा हुने घरेलु हिंसा सम्बन्धि संजाल) की बार्ब मेक्वाएरी भन्नुहुन्छ ‘ महामारीको सन्दर्भभन्दा बाहेक पनि आईसोलेसन (एक्लो बनाउने) एउटा घरेलु हिंसा गर्नेहरुद्धारा स्थापित रणनीति हो

भारतको यातायात संगठनले नेतृत्व गरेको, १४,५६१ व्यक्तिहरुले घरेलु हिंसा सम्बन्धि उनिहरुको व्यक्तिगत अनुभवहरु समेट्ने  एउटा राष्ट्रिय अध्ययन अनुसार ‘ मेरो कार्यस्थल मात्र एउटा यस्तो स्थान थियो जसले मलाई सध्य राखेको थियो र मैले घरमा घरेलु हिंसा भोगिरहेको बेलामा त्यसको सामना गर्न मद्दत गरेको थियो।भन्ने जस्तो प्रतिक्रिया सबैभन्दा जोडदार रुपले आएको थियो।  

आईएलओ महासन्धि १९० ले घरेलु हिंसालाई कार्यस्थलको मु्द्दा भनेर पहिचान गरेको छ, र रोजगारदाता, सरकार एवं संगठनहरुले उपयुक्त उपायहरु अपनाएर कार्यस्थलमा हुने घरेलु हिंसाको असरलाई पहिचान गरी रोकथाम गर्नुपर्छ भनेर भन्दछ (सी १९० प्रस्तावना, धारा १० (च), मुख्य सिद्दान्त सिफारिस, ३(१८)। 

महामारीमा घरेलु हिंसाको जोखिममा परेका कामदारहरुलाई रोजगारदाताहरुले कसरी सहयोग प्रदान गर्न सक्छन् भनेर यहाँ डीभी@वर्क नेटवर्कको (कार्यस्थलमा घरेलु हिंसा बिरुद्धको संजालको) वेबसाईटबाट पढ्नुहोस्। 

कार्यस्थलमा हिंसा बढ्ने खतरा यसै पनि पुरुष हावी भएको क्षेत्रहरुमा महिलाहरुको कम प्रतिनिधित्व थियो र त्यसमाथि, यस महामारीले मजदुरहरुको सहभागीतामा अस्थाई एवं थाई रुपमा ल्याएको कमी, वा सीमाना बन्द भएको कारणले गर्दा अलपत्र परेका लाखौँ मजदुरहरुको कारणले गर्दा कार्यस्थलमा महिलाहरु अझै बढि एक्लो परेका छन् ।

उदाहरणको लागी –  महिलाहरु समेत संलग्न रहेको २००,००० भन्दा बढी समुन्द्रमा काम गर्ने कामदारहरुले आफ्नो कन्ट्र्याक्ट पुरा गरी घर फर्किन चाहाँदै छन्। सरकारले  यात्रा  पारवहनमा  लगाएको प्रतिबन्धहरुले गर्दा ,कोभीड१९ महामारीको बेलामा उनीहरुआफनो घर फर्कन पाइरहेका छैनन्।. संकटको बेलामा एक्लो बनाइने क्रियाकलापले महिलाहरुको कार्यस्थलमा हुने हिंसाको जोखिम बढेको छ। .

शहरी यातायातमा ग्राहकहरुको सम्पर्कमा आई काम गर्ने कामदारहरुले, यी जोखिमहरुको सामना गर्नुको साथै, भाईरससँगको सम्पर्क बढ्ने खतराको सामना गर्नुपर्ने स्थिति  छ। रङ्ग भेद भोगेका महिलाहरु, आप्रवासी महिलाहरु वा अपाङ्गता भएका महिलाहरुका निम्ति केही साझा असरहरु छन्।  रेलवेमा काम गर्ने फरक वर्णकी एक महिलालाई कार्यस्थलमा आफूलाई भाईरस लागेको छ भनेर बताउने एकजना पुरुषले थुक्नाले, ती महिलाको मृत्यु भएको एउटा घातक घटना घट्यो। 

 कार्यस्थलमा काम गर्ने बेलामा, कामसँग सम्बन्धित भएमा वा कामको कारणले उत्पन्न हुने हिंसा र उत्पीडनमा, आईएलओ महासन्धि १९० लागु हुन्छ।  यस अन्तर्गत कार्यस्थलमा आउने र जाने क्रममा र रोजगारदाताले उपलब्ध गराएको बास स्थानमा हुने हिंसा र उत्पीडनहरु पर्दछन्। कामदारहरुले कार्यस्थलमा भोग्ने यस किसिमको  संकटलाई, हिंसा एवं उत्पीडनको खाकामा राखेर सम्बोधन गर्नको निम्ति धारा ३(क), (ङ), (च) ले सहयोग गर्छन्। 

कार्यस्थललाई हरेक दिन पुन: परिभाषित गरिँदै छ। 

सुचना तथा संचार प्रविधिको माध्यमबाट कार्यस्थलसँग सम्बन्धित संचारयो पहिले देखिन नै कार्यस्थलको अङ्ग हो- महामारीको कारणले गर्दा झन बढेको छ। अनलाईन बैठकहरु, डीजीटलाईजेसन/विद्युतीय कार्यलय (ई-अफिस) को माध्यमबाट महामारीको दौरानमा कार्यलय बाहिरबाट काम गर्दा आउने चुनौतीहरुसँग अनुकुलन गर्नको निम्ति, काम गर्ने तरीकामा तीब्र परिवर्तन आएको छ। ईन्टरनेट प्रयोग गरेर तर्साउने (साईबर बुलिइङ्ग) र ट्रोलहरुको प्रयोग गर्नाले, काम गर्ने नयाँ तरिकामा उत्पीडन र हिंसाको जोखिम बढेको छ।   

सी १९० अन्तर्गत कार्यस्थलमा काम गर्ने बेलामा, कामसँग सम्बन्धित भएमा वा कामसँग सम्बन्धित संचार, लगायत सूचना तथा संचार प्रविधिको कारणले उत्पन्न हुने हिंसा र उत्पीडन पर्दछन्। (महासन्धि १९०, धारा ३ घ)    

व्यवसाहिक स्वास्थ्य र सुरक्षा लैङ्गिक विभाजनको प्रकृती रहेको यातायात व्यवसायमा, महिलाहरुले महामारीको बेलामा प्राय अग्रपङ्कतिमा ग्राहकहरुको सम्पर्कमा आई सरसफाई गर्ने भूमिका निर्वाह गरिरहेका हुन्छन्। यसमा संक्रमण र मनोवैज्ञानिक असरहरु पर्नसक्ने उच्च जोखिम हुन्छ।  यस्तो बढ्दो सम्पर्क अनि पर्याप्त एवं उपयुक्त व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) को अभाव, र आफूलाई महामारी सम्बन्धि लागेको चिन्ता, कार्यस्थलमा हुने घातक खतरा, अनि परीवार जोखिममा परेको कारणले घरमा बढेको तनावलाई समाधान गर्ने मनोवैज्ञानिक सहायता नहुनाले, र बहुसंखिय महिलाहरुल कठीन काम गर्ने कामदारहरु हुने हुनाले, महिला यातायात कामदारहरुले कोरोना भाईरसको नकरात्मक असरहरु असमानुपातिक रुपमा भोग्नेछन्।

“हामीलाई पीपीई कीटहरुको अभाव छ र घरमा भाईरस लिएर जान्छौँ कि भन्ने डर छ, त्यसैले हाम्रा बच्चाबच्चीलाई हामीबाट टाढा राख्न हामी प्रयास गर्छौँ। यी चुनौतीहरु भएतापनि, सबैजनाको सरसफाई कायम राख्नमा महत्वपूर्ण भूमिका खेलेकोमा हामीलाई गर्व छ- रेलवे कामदार, भारत

महासन्धि सी १९० ले हिंसा एवं उत्पीडन र सोसँग सम्बन्धित मनोसामाजिक जोखिमहरुलाई स्वास्थ्य र सुरक्षा जोखिमको रुपमा पहिचान गर्छ र रोजगारदाताहरुको प्रतिनिधि एवं कामदारहरुको संगठनसँग परामर्श लिएर, विद्यमान व्यवसाहिक सुरक्षा र स्वास्थ्यका उपायहरुलाई विस्तार वा अनुकुलन गरी, हिंसा र उत्पीडनलाई सान्दर्भिक रा्ष्ट्रिय नीतिहरुमा समायोजन गर्ने शुनिश्चित गर्नको लागी सरकारले कदमहरु चाल्नु पर्छ भनेर महासन्धि सी १९० ले भन्दछ। (महासन्धि सी १९०- धारा ९,११,१२) 

कोभीड१९ प्रतिकार्यमा महिला कामदारहरुको सहभागिता समावेशिता    

कोभीड-१९ को विश्व अर्थतन्त्रमा दीर्घकालीन असर पर्नेछ भनेर हामीलाई थाहा छ, र सबैभन्दा अगाडी प्रभावित हुने जोखिम उन्मुख समूहहरु, सबैभन्दा बढी प्रभावित हुने महिलाहरु लगायत अन्य यस्ता समूहहरु हुनेछन्।

प्राध्यापक टेसा राईटले यातायात क्षेत्रलाई पनि समावेश गरी  लिङ्ग र पुरुष हावी क्षेत्रहरु, मा गरेको अनुसन्धानले भने जस्तै, सकरात्मक लैङ्गिक गतिविधिले, कडा परिश्रमको साथमा, विशेष सार्वजनिक वित्तका अवसरहरु, लगायत सार्वजनिक भौतिक संरचना र सेवा प्रदानार्थ कार्यरत नीजि वित्तलाई समेटेर, परियोजनाको मुख्य उद्देश्यको एउटा अंश हुनसकेमा, महिलाहरुको अवस्था सुधार गर्ने रणनीतिहरु सफल हुन्छन् भनेर हामीलाई थाहा छ। 

महामारीमा अघि बढ्दै गर्दा, अर्थतन्त्रको पुन:निर्माण गर्ने सरकारको महत्वपुर्ण जिम्मेवारी छ। सार्वजनिक एवं नीजि कोषहरुको माध्यमबाट उल्लेखनिय रुपमा आर्थिक उत्प्रेरणाहरु आएको अवस्थामा, मुख्य लगानी मापदण्डमा लैङ्गिक न्यायलाई समावेश गर्न जरुरी छ। उद्दार कोष, आर्थिक नीतिहरु, र बेरोजगारी बापत पाईने लाभहरुलाई वास्तवमै समावेशी बनाउनका निम्ति लैङ्गिक दृष्टिकोणबाट जानकारी प्रदान गर्नुपर्छ। त्यसैले कोभीड-१९ प्रतिकार्यका निम्ति लैङ्गिक प्रभाव मुल्याङ्कन सहित अन्य लैङ्गिक दृष्टिकोण पनि लागु गर्ने सुनिश्चित गर्नुपर्छ।  .

सिफारिस संख्या २०६ ले तथ्याङ्कको महत्वलाई पहिचान गर्छ। यसले, लैङ्गिकता, हिंसा र उत्पीडनको प्रकार, र आर्थिक गतिविधिका क्षेत्रहरु, लगायत जोखिम उन्मुख अवस्थामा रहेका समूहहरुको विशेषताको आधारमा विभाजित तथ्याङ्कको संकलन एवं प्रकाशनका निम्ति प्रयास गर्न राज्यलाई आग्रह गर्छ। कार्यस्थलमा हुने हिंसा र उत्पीडनलाई रोकथाम एवं सम्बोधन गर्नको निम्ति नीतिगत प्रतिकार्यहरुलाई जानकारी दिई अनुगमन गर्न जरुरी हुन्छ। (अनुच्छेद. २२ सिफारिस २०६)

‘दिगो व्यवसाय प्रवर्धन र हिंसा एवं उत्पीडन सँगसँगै जान सक्दैनन् र यसले कामको संगठन, कार्यस्थलको सम्बन्धहरु, कामदारको संलग्नता, व्यवसायको प्रतिष्ठा, र उत्पादनशीलतालाई नकरात्मक प्रभाव पार्दछ।’ (महासन्धि १९० प्रस्तावना) भनेर आईएलओले प्रकाश पारेको जस्तै, दिगो व्यवसायको लागी एउटा न्याययु्क्त, सुरक्षीत कार्यस्थलको वातावरण एवं कामदारहरु बिचको समानता अपरिकार्य हुन्छ र यसका निम्ति महासन्धि १९० ले निम्ति रुपरेखा प्रदान गर्छ।

महिला यातायात मजदुरहरुका अधिकारहरु र कोभीड-१९ सम्बन्धि आईटीएफको भागहरुको बारेमा थप जान्नको लागी यहाँ  जानुहोस्।  

आईटीयूसीले निम्न कुराहरु समावेश गरी केही सामाग्रीहरु तयार पारेको छ: 

  • सामाजिक संजालको ग्राफिक्सहरु र जीफहरु( GIFs)
  • प्राय सोधिने प्रश्नहरु (FAQs)
  • सी १९० सम्बन्धि छोटो निर्देशन
  • सरकारसँग पैरवी गर्न( लोबिईङ्) नमुना पत्र

समस्त सामाग्रीहरु https://www.ituc-csi.org/GBV मा उपलब्ध छन्।

आईटीएफ सी १९० अभियानको बारेमा थप जान्नको लागी, तपाईँको संगठन वा सरकारको यससँग सम्बन्धित गतिविधिहरुको बारेमा जानकारी पाउन, वा यसमा संलग्न हुनको निम्ति, हामीलाई women@itf.org.uk मा पत्राचार गर्नुहोस्।

Конвенция МОТ об искоренении насилия и домогательств в сфере труда, и кризис COVID-19

Конвенция № 190 об искоренении насилия и домогательств, которая создает перспективу сферы труда, свободной от насилия и домогательств, появилась в годовщину столетия МОТ, 21 июня 2019 года.

Эта Конвенция была принята, когда мы еще не знали, что нам придется пережить COVID 19 – кризис в области здравоохранения и экономики, который серьезно повлияет на нашу сферу труда. Пандемия усилила уже существующую в ней дискриминацию и насилие. Маргинальные группы, группы меньшинств и другие незащищенные группы, в том числе неформальные работники и трудовые мигранты, сталкиваются с непропорционально сильным воздействием вируса, что делают эту всеобъемлющую Конвенцию одним из важнейших инструментов для защиты прав наемных работников. 

Конвенция МОТ № 190 касается проблемы насилия и домогательств, включая гендерное насилие в сфере труда в отношении всех работников

Конвенция № 190 является инструментом защиты и содействия правам всех работников в борьбе против насилия и домогательств, включая гендерное насилие, во время и после этого кризиса.

Конвенция № 190 относится ко всем секторам, как частным, так и государственным, как в формальной, так и в неформальной экономике, как в городских, так и в сельских районах. (Статья 2)

Сказав это, важно иметь в виду, что работающие женщины – которые чрезмерно представлены в неформальном секторе экономики, нестандартных формах занятости и в профессиях, разделенных по половому признаку, особенно в секторах, где доминируют мужчины, таких как транспорт – сталкиваются с конкретными и дополнительными последствиями пандемии. Они часто работают на передовой, исполняя роли, подразумевающие общение с клиентами, такие как продавцы билетов, бортпроводники, уборщики, проводники и работники аэропортов, подвергаясь при этом повышенному риску насилия, последствиям для здоровья и экономическим последствиям во время пандемии. 

Насилие и домогательства в сфере труда 

Произошел глобальный всплеск инцидентов и сообщений, связанных с бытовым насилием. Одной из причин является неожиданная смена физического места работы, поскольку многие страны находятся/находились в полной изоляции, в результате чего многие потерпевшие оказались изолированы в своих домах вместе со своими насильниками.  

Обращаясь к теме, касающейся причин резкого роста бытового насилия во время пандемии, Барб Маккуори из сети DV@Work отмечает, что «Изоляция – это уже устоявшаяся тактика бытовых насильников, даже вне контекста пандемии».  

Согласно недавнему общенациональному исследованию, проведенному транспортными профсоюзами в Индии, в ходе которого 15 561 человек поделился своим личным опытом, касающимся бытового насилия, повсеместный резонанс получил следующий ответ: «мое предприятие было единственным местом, которое поддерживало меня в здравом уме и помогало справиться с ситуацией, когда я сталкивался с бытовым насилием».

Конвенция МОТ № 190 признает бытовое насилие как производственную проблему и гласит, что работодатели, правительства и профсоюзы должны принимать соответствующие меры для выявления и смягчения последствий бытового насилия в сфере труда. (Конвенция № 190, преамбула, статья 10 (f), основной принцип рекомендации, III (18).

Читайте здесь, как работодатели могут оказывать поддержку наемным работникам, незащищенным от бытового насилия во время пандемии, на веб-сайте сети DV@Work. 

Повышенный риск насилия на рабочем месте. Женщины были недостаточно представлены в секторах, где преобладают мужчины, и во время этой пандемии они еще больше изолированы на своем рабочем месте из-за массового сокращения рабочей силы – временного или постоянного – или из-за закрытия границ, в результате чего миллионы работников оказались в затруднительном положении.

Например: более 200 000 моряков, включая женщин, у которых истек срок действия их трудовых договоров на судах по всему миру и которые хотят вернуться домой. Введенные правительствами ограничения на поездки и транзит не позволяли им делать это во время пандемии Covid-19. Эта изоляция во время кризиса повысила уязвимость женщин перед насилием на рабочем месте.

Те же риски, наряду с повышенным воздействием вируса, существуют и у работников городского транспорта, работающих с клиентами. Темнокожие женщины, женщины-иммигранты или женщины-инвалиды сталкиваются с пересекающимися друг с другом воздействиями. Один случай со смертельным исходом произошел, когда темнокожая железнодорожница в Лондоне скончалась после того, как на нее плюнул мужчина, который сказал, что у него вирус. 

Конвенция МОТ № 190 применяется к случаям насилия и домогательств в сфере труда, возникающим в ходе работы, связанным с работой или вытекающим из работы. Это включает в себя поездку на работу и обратно и жилье, предоставленное работодателем. Статья 3 (a), (e), (f) предоставляет работникам возможность справляться на рабочем месте с конфликтом, подобным этому, в контексте насилия и домогательств.

Сфера труда меняется каждый день 

Связанное с работой общение посредством информационных и коммуникационных технологий,уже ставших частью нашей сферы труда, расширилось из-за пандемии. Происходит быстрый сдвиг в способах работы, включая онлайн-заседания, цифровизацию/электронные офисы, чтобы приспособиться к вызовам удаленной работы во время пандемии. На этих новых видах работы повышается риск домогательств и насилия, включая киберзапугивание и троллинг.

Конвенция  № 190 включает в себя тему насилия и домогательств в сфере труда, возникающие в ходе работы, связанные с работой или вытекающие из нее, в том числе связанные с работой средств связи, включая использование информационных и коммуникационных технологий; (Конвенция 190, статья 3 d).

Охрана труда. В результате разделенного по половому признаку характера транспортной отрасли женщины концентрируются на передовых рубежах борьбы с этой пандемией, исполняя роли, подразумевающие общение с клиентами и уборку, подвергаясь более высокому риску заражения и психологических последствий. Это повышенное воздействие в сочетании с недостатком адекватных и надлежащих средств индивидуальной защиты (СИЗ), и отсутствием психологической поддержки, чтобы справиться с обеспокоенностью клиентов, смертельными рисками на рабочем месте, повышенным стрессом дома, связанным с угрозами для семьи, и тем фактом, что женщины также составляют большинство в нестандартных формах занятости и значит будут непропорционально страдать от негативных последствий кризиса коронавируса.

«Нам не хватает наборов средств индивидуальной защиты, и мы боимся принести вирус домой, поэтому стараемся держать наших детей подальше от нас. Даже несмотря на эти проблемы, мы гордимся тем, что играем важную роль в поддержании чистоты для всех». – Железнодорожник, Индия

Конвенция  № 190 признает насилие и домогательства, а также связанные с ними психосоциальные риски угрозой для здоровья и безопасности, и обязывает правительства принимать меры, консультируясь с представительными организациями работодателей и наемных работников, добиваясь включения проблемы насилия и домогательств в соответствующую национальную политику, в том числе путем расширения или адаптации существующих мер по охране труда. (Конвенция 190 – статья 9,11,12) 

Присутствие работающих женщин и их участие в реагировании на COVID-19 

Как мы знаем, COVID-19 будет оказывать долгосрочное воздействие на мировую экономику, и наиболее уязвимыми группами, которых это коснется в первую очередь, станут группы, на которые это воздействие окажется также наиболее сильным, включая женщин.

По исследованиям профессора Тессы Райт о гендерных проблемах и отраслях, в которых доминируют мужчины, включая транспорт, мы знаем, что стратегии улучшения положения трудящихся женщин достигают успеха, когда позитивные гендерные действия осуществляются в рамках основных проектных целей и комплексной проверки; при этом конкретные возможности связаны с государственным финансированием, а также с частным финансированием общественной инфраструктуры и предоставления услуг.

По мере того, как мы преодолеваем пандемию, правительства несут основную ответственность за восстановление экономики. При существенном экономическом стимулировании через государственные и частные фонды жизненно важно, чтобы гендерная справедливость была интегрирована в основные инвестиционные критерии. Фонды помощи, экономическая политика, пособия по безработице должны рассматриваться через «гендерную призму», чтобы сделать их действительно комплексными. Таким образом, крайне важно обеспечить применение «гендерной призмы» при реагировании на COVID-19, в том числе посредством анализа гендерного воздействия

Рекомендация № 206 признает важность данных. Она призывает государства прилагать усилия для сбора и публикации статистических данных с разбивкой по признаку пола, формам насилия и домогательств, и секторам экономической деятельности, а также характеристикам групп в уязвимых ситуациях. Это необходимо для информирования и мониторинга политических мер по предотвращению и решению проблемы насилия и домогательств в сфере труда (пункт 22 R206).

Конвенция № 190 предусматривает создание дорожной карты для справедливой, безопасной рабочей среды и равенства для всех наемных работников, что имеет решающее значение для устойчивости предприятий, поскольку МОТ подчеркивает, что «насилие и домогательства несовместимы с развитием устойчиво работающих предприятий и негативно влияют на организацию труда, отношения на рабочем месте, вовлеченность работников, репутацию предприятия и производительность» (Конвенция № 190, преамбула). Таким образом, Конвенция также играет ключевую роль в восстановлении мировой экономики. 

Узнайте больше о требованиях МФТ, касающихся прав женщин-транспортников и COVID-19,здесь. 

МКП выпустила ряд материалов, в том числе:

  • Графика и форматы обмена графическими данными в социальных сетях;
  • Часто задаваемые вопросы;
  • Мини-руководство по Конвенции № 190;
  • Образец письма для лоббирования правительств.

Все эти материалы доступны по адресу:

https://www.ituc-csi.org/GBV

Чтобы узнать больше о кампании МФТ в отношении Конвенции № 190, поделиться информацией о действиях по ратификации, предпринимаемых вашим профсоюзом или правительством, или принять в этом участие, пишите нам по адресу women@itf.org.uk 

Convenção da OIT sobre Violência e Assédio e a crise de COVID-19

A Convenção sobre Violência e Assédio – C190, que promete um mundo do trabalho livre de violência e assédio, surgiu durante o ano do centenário da OIT, em 21 de junho de 2019.

Quando a Convenção foi conquistada, não sabíamos que enfrentaríamos a COVID 19 – uma crise de saúde e econômica que está afetando gravemente nosso mundo do trabalho.   A pandemia intensificou a discriminação e a violência que já existiam no mundo do trabalho. Os marginalizados, as minorias e outros grupos vulneráveis, incluindo trabalhadores e trabalhadoras informais e imigrantes, estão enfrentando os impactos do vírus de forma desproporcional, o que faz dessa Convenção inclusiva um instrumento crucial para proteger os direitos dos trabalhadores e das trabalhadoras.

A Convenção 190 da OIT trata da violência e assédio, incluindo violência de gênero no mundo do trabalho para todos os trabalhadores e trabalhadoras

A Convenção 190 é um instrumento de proteção e promoção dos direitos de todos os trabalhadores e trabalhadoras contra violência e assédio, incluindo violência de gênero, durante esta crise e além dela. A Convenção 190 é aplicável a todos os setores, públicos ou privados, tanto da economia formal como da informal, e em áreas urbanas ou rurais. (Artigo 2)

Tendo dito isso, é importante observar que as mulheres trabalhadoras – que são maioria na economia informal, em trabalhos precários e em funções com alta segregação de gênero, principalmente em setores de predominância masculina como o de transporte – estão enfrentando impactos específicos e adicionais da pandemia. Elas normalmente trabalham na linha de frente em funções de contato direto com clientes, como vendedoras de bilhetes, tripulantes de cabine, faxineiras, condutoras e trabalhadoras em aeroportos, ficando mais vulneráveis à violência e aos impactos na saúde e econômicos durante a pandemia. 

Violência e assédio no mundo do trabalho 

Houve um aumento global dos incidentes e relatos de violência doméstica. Um dos motivos foi a repentina mudança dos locais de trabalho físicos, já que muitos países estiveram/estão em confinamento total, deixando muitas sobreviventes isoladas em casa com o agressor.  

Sobre a causa do aumento drástico da violência doméstica durante a pandemia, Barb Macquarie, da rede DV@Work, declarou que “O isolamento já é uma tática usada pelos autores de violência doméstica mesmo fora do contexto de uma pandemia”

Segundo um estudo nacional recente, liderado pelos sindicatos de transportes na Índia, no qual 15.561 pessoas relataram suas experiências pessoais de violência doméstica, todas responderam que o meu local de trabalho era o único lugar que me mantinha sã(o) e que me ajudou quando precisei enfrentar a violência doméstica em casa”.

A Convenção 190 da OIT reconhece a violência doméstica como um problema do local de trabalho e declara que empregadores, governos e sindicatos devem tomar as devidas providências para reconhecer e mitigar os impactos da violência doméstica no mundo do trabalho. (Preâmbulo da C190, Artigo 10(f), Princípio fundamental da recomendação, III (18).

Leia aqui como os empregadores podem apoiar os trabalhadores vulneráveis à violência doméstica durante a pandemia, no site da rede DV@Work. 

Aumento do risco de violência no local de trabalho As mulheres já são minoria em setores de predominância masculina e ficam mais isoladas em seu local de trabalho durante a pandemia devido aos enormes cortes na força de trabalho – temporária ou permanente – ou devido ao fechamento de fronteiras que deixou milhões de trabalhadoras(es) sem poder voltar para casa.

Por exemplo: Mais de 200.000 marítimos, incluindo mulheres, que terminaram seus contratos a bordo de navios em todo o mundo e querem voltar para casa. As restrições de viagem e trânsito dos governos impediu-as(os) de voltar para casa durante a pandemia de Covid-19. Este isolamento durante tempos de crise deixou as mulheres mais vulneráveis à violência no local de trabalho.

As trabalhadoras em contato direto com clientes nos transportes urbanos enfrentam os mesmos riscos, juntamente com o aumento da exposição ao vírus.  Para mulheres negras, imigrantes ou com deficiências há os impactos cruzados, um exemplo fatal foi uma mulher negra, trabalhadora ferroviária em Londres, que morreu após ser cuspida no trabalho por um homem que afirmou ter o vírus.

A Convenção 190 da OIT aplica-se à violência e ao assédio no mundo do trabalho que ocorrem durante o trabalho, relacionados com o trabalho ou em resultado do trabalho. Incluindo durante o trajeto entre o domicílio e o local de trabalho e no alojamento proporcionado pela entidade empregadora. O artigo 3 (a), (e), (f) prepara os trabalhadores para lidar com uma crise no local de trabalho como no contexto de violência e assédio.

O mundo do trabalho está sendo redefinido todos os dias 

As comunicações relacionadas com o trabalho, por meio de tecnologias da informação e de comunicação – que já faziam parte do nosso mundo do trabalho – aumentaram devido à pandemia. As formas de trabalho estão mudando rapidamente, incluindo reuniões online, escritórios digitalizados/eletrônicos, a fim de se adaptarem aos desafios do trabalho remoto durante a pandemia. Há aumento do risco de assédio e violência nessas novas formas de trabalho, incluindo bullying cibernético e trolls.

A C190 inclui violência e assédio no mundo do trabalho que ocorrem durante o trabalho, relacionados com o trabalho ou em resultado do trabalho, incluindo comunicações relacionadas com o trabalho efetuadas com recurso a tecnologias da informação e de comunicação; (Convenção 190, Artigo 3 d)

Saúde e segurança ocupacional Devido à natureza sexista da indústria do transporte, as mulheres estão concentradas nas linhas de frente desta pandemia, em funções de contato direto com clientes e de limpeza, correndo maior risco de infecção e impactos psicológicos. Essa alta exposição, aliada à falta de equipamentos de proteção individual (EPI) adequados e apropriados e de apoio psicológico para lidar com a ansiedade dos clientes, riscos fatais no local de trabalho, aumento do estresse em casa devido ao risco à família, e o fato de que a maioria dos trabalhadores precarizados são mulheres, faz com que as mulheres trabalhadoras em transportes sofram de forma desproporcional os impactos negativos da crise do coronavírus.

Estamos com falta de kits de EPIs e com medo de levar o vírus para casa, então tentamos manter nossos filhos longe de nós. Mesmo com estes desafios, temos orgulho em desempenhar um papel importante, mantendo a limpeza para todos.” – Trabalhadora ferroviária, Índia

A Convenção C190 reconhece a violência e o assédio e os riscos psicossociais associados, como riscos à saúde e segurança, e declara que os governos, em consulta com organizações representantes dos empregadores e dos trabalhadores, devem tomar providências que garantam que a violência e o assédio sejam incluídos nas políticas nacionais relevantes, incluindo a ampliação ou adaptação das medidas de saúde e segurança ocupacional existentes. (Convenção 190 – Artigos 9,11,12)

Visibilidade de mulheres trabalhadoras e inclusão na resposta à COVID-19 

Como sabemos, a COVID-19 causará um impacto de longo prazo na economia global e os grupos mais vulneráveis serão os primeiros a serem afetados e serão também os mais afetados, incluindo as mulheres.

Com base na pesquisa da Professora Tessa Wright sobre gênero e indústrias sob domínio masculino incluindo transportes, sabemos que estratégias para melhorar a situação das mulheres trabalhadoras dão certo quando ações positivas de gênero fazem parte dos principais objetivos do projeto e da due diligence, com oportunidades particularmente vinculadas à financiamento público, e financiamento privado para infraestrutura pública e entrega de serviços.

Conforme navegamos pela pandemia, os governos têm a responsabilidade essencial de reconstruir a economia.  Com estímulo econômico significativo por meio de fundos públicos e privados, é essencial que a justiça de gênero seja integrada nos principais critérios de investimento. Fundos de ajuda, políticas econômicas e seguros-desemprego precisam levar em conta o aspecto do gênero para que sejam verdadeiramente inclusivos. É essencial garantir que o gênero seja levado em consideração na resposta à COVID-19, incluindo por meio de avaliações de impacto de gênero.

A Recomendação No. 206 reconhece a importância dos dados. Solicita que os estados façam esforços para coletar e publicar estatísticas desagregadas por sexo, formas de violência e assédio e setor da atividade econômica, assim como por características de grupos em situações vulneráveis. Isso é necessário para instruir e monitorar as respostas das políticas para prevenir e lidar com a violência e assédio no mundo do trabalho (Para. 22 R206).

A Convenção 190 fornece um guia para um ambiente de trabalho justo e seguro e igualdade para todos os trabalhadores e trabalhadoras, fundamentais para a sustentabilidade das empresas, como destaca a OIT “a violência e o assédio são incompatíveis com a promoção de empresas sustentáveis e afetam negativamente a organização do trabalho, as relações de trabalho, o empenho dos trabalhadores, a reputação das empresas e a produtividade” (Preâmbulo da Convenção 190). Assim, a Convenção também é fundamental para a reconstrução da economia global. 

Saiba mais sobre a exigência da ITF para Direitos das mulheres trabalhadoras em transportes e a COVID -19 aqui.  

A ITUC produziu vários materiais, incluindo:

  • Imagens e GIFS para mídia social
  • Perguntas frequentes
  • Miniguia da C190
  • Modelo de carta para fazer pressão nos governos

Todo o material está disponível em:

https://www.ituc-csi.org/GBV

Para saber mais sobre a Campanha C190 da ITF, compartilhar informações sobre a ação de ratificação do seu sindicato ou governo, ou para participar, escreva para nós em women@itf.org.uk 

La Convention de l’OIT sur la violence et le harcèlement et la crise du Covid-19

La Convention nº 190 sur la violence et le harcèlement (C190) qui promet un monde du travail exempt de violence et de harcèlement, a vu le jour au cours de l’année du Centenaire de l’OIT, le 21 juin 2019.

À cette époque, nous ne savions pas que nous ferions l’expérience du Covid-19 – une crise sanitaire et économique avec de graves répercussions sur notre monde du travail. La pandémie a exacerbé la discrimination et la violence qui gangrénaient déjà le monde du travail. Le virus touche démesurément les groupes marginalisés, minoritaires et autres groupes vulnérables, y compris les travailleurs informels et migrants, faisant de cette convention inclusive un instrument indispensable pour protéger les droits des travailleurs.

La Convention n° 190 de l’OIT aborde la question de la violence et du harcèlement, y compris la violence sexiste, dans le monde du travail et s’applique à tous les travailleurs

La Convention n° 190 est un instrument destiné à protéger et à promouvoir les droits de tous les travailleurs et travailleuses contre la violence et le harcèlement, y compris la violence sexiste, durant la crise actuelle et au-delà. La Convention n° 190 s’applique à tous les secteurs, public ou privé, dans l’économie formelle ou informelle, en zone urbaine ou rurale. (Article 2)

Il convient ici de noter que la pandémie a des répercussions spécifiques et supplémentaires sur les travailleuses – qui sont surreprésentées dans l’économie informelle, dans le travail précaire et dans des rôles traditionnellement dévolus à leur genre, en particulier dans les secteurs à prédominance masculine comme les transports. En effet, celles-ci travaillent souvent en première ligne en contact direct avec les clients (c’est le cas par exemple des préposées à la billetterie, des hôtesses de l’air, des agents de nettoyage, des receveuses et des employées d’aéroport, qui sont donc plus vulnérables à la violence ainsi qu’aux incidences sanitaires et économiques durant la pandémie. 

La violence et le harcèlement dans le monde du travail 

Le nombre d’incidents et de rapports relatifs à la violence domestique a augmenté à l’échelle planétaire. Ce bilan s’explique notamment par le changement soudain du lieu de travail physique, dès lors que de nombreux pays ont ou avaient opté pour un confinement total, obligeant bon nombre de survivantes à rester enfermées dans leur foyer avec leur agresseur.

Évoquant la cause de cette augmentation spectaculaire de la violence domestique durant la pandémie, Barb Macquarie, du réseau DV@Work, déclare que « l’isolement est déjà une tactique bien établie en matière de violence domestique, même en dehors d’un contexte de pandémie. »

Selon une récente étude nationale menée par les syndicats des transports en Inde auprès de 15 561 personnes évoquant leurs expériences personnelles de violence domestique, une réponse a trouvé un écho tout particulier : « mon lieu de travail était le seul endroit qui m’empêchait de perdre la raison et m’a aidé à faire face à la violence que je subissais à la maison. »

La Convention n° 190 de l’OIT reconnaît la violence domestique comme une question qui concerne le lieu de travail et stipule que les employeurs, les gouvernements et les syndicats doivent prendre les mesures appropriées pour reconnaître les effets de la violence domestique et atténuer son impact dans le monde du travail. (C190 : Préambule, Article 10(f) ; Recommandation : Principes fondamentaux, III(18).

Cliquez sur ce lien pour découvrir de quelle manière les employeurs peuvent offrir un soutien aux travailleuses et travailleurs vulnérables à la violence domestique durant la pandémie, sur le site web du réseau DV@Work. 

Risque accru de violence sur le lieu de travail Les femmes étaient déjà sous-représentées dans les secteurs à prédominance masculine et sont encore davantage isolées sur leur lieu de travail pendant cette pandémie, en raison de réductions massives des taux de participation au marché du travail – temporaires ou permanentes – ou consécutivement à la fermeture des frontières qui a laissé des millions de personnes bloquées à l’étranger.

À titre d’exemple : Plus de 200 000 gens de mer, y compris des femmes, ont terminé leurs contrats en mer aux quatre coins du globe et veulent à présent quitter leur navire pour rentrer chez eux. Mais cela leur est impossible dans le contexte actuel de pandémie, en raison des restrictions imposées par les gouvernements en matière de déplacement (voyages et transit). Cet isolement en temps de crise accroît la vulnérabilité des femmes à la violence sur le lieu de travail.

Des risques similaires, ainsi qu’une exposition accrue au virus, existent pour les travailleurs en contact avec les clients dans les transports urbains. Pour les femmes de couleur, les femmes immigrées ou les femmes handicapées, les impacts se recoupent, avec l’exemple tragique offert par les chemins de fer londoniens et le cas d’une cheminote noire décédée du virus après qu’un homme déclarant être porteur du virus lui a craché dessus.

La Convention n° 190 de l’OIT s’applique à la violence et au harcèlement dans le monde du travail s’exerçant à l’occasion, en lien avec ou du fait du travail. Sont inclus ici les trajets entre le domicile et le lieu de travail et le logement fourni par l’employeur. Alinéas a), e), f) de l’Article 3. Les travailleurs sont ainsi armés pour affronter une crise telle que celle-ci au travail dans le cadre de la violence et du harcèlement.

Le monde du travail se redéfinit au quotidien. 

Les communications liées au travail qui s’appuient sur les technologies de l’information et de la communication – et qui font déjà partie de notre monde du travail actuel – ont augmenté en raison de la pandémie. Les modes de travail évoluent rapidement, y compris les réunions en ligne, la numérisation/les bureaux numériques, pour s’adapter aux défis du travail à distance durant la pandémie. Ces nouveaux modes de travail s’accompagnent d’un risque accru de harcèlement et de violence, y compris la cyberintimidation et le trolling.

La C190 s’applique à la violence et au harcèlement dans le monde du travail s’exerçant à l’occasion, en lien avec ou du fait du travail, y compris dans le cadre de communications liées au travail, y compris celles effectuées au moyen de technologies de l’information et de la communication ; (Convention 190, Article 3 d)

Santé et sécurité au travail En raison de la ségrégation fondée sur le genre qui caractérise le secteur des transports, les femmes sont très présentes en première ligne de cette pandémie, qu’elles soient en contact direct avec les clients ou qu’elles assurent des tâches de nettoyage présentant un risque plus élevé de contamination et de conséquences psychologiques. Cette exposition accrue, conjuguée au manque d’équipement de protection individuelle adéquat (EPI) et de soutien psychologique afin de faire face à l’anxiété des clients, aux risques de décès sur le lieu de travail, au stress accru à la maison en raison du risque induit pour la famille, et au fait que les femmes constituent la majorité des travailleurs précaires, a pour conséquence que les travailleuses des transports pâtiront davantage des effets négatifs de la crise du coronavirus.

« Nous manquons de kits EPI et nous avons peur de ramener le virus à la maison, alors nous essayons de garder nos enfants loin de nous. Même confrontées à ces difficultés, nous sommes fières de jouer un rôle important en assurant la propreté pour tous. » – Cheminote, Inde

La C190 reconnaît la violence et le harcèlement et les risques psychosociaux qui y sont associés comme des risques pour la santé et la sécurité et stipule que les gouvernements doivent prendre des mesures, en consultation avec les organisations représentatives d’employeurs et de travailleurs, afin de garantir que la question de la violence et du harcèlement est traitée dans les politiques nationales pertinentes, y compris en étendant, ou en adaptant, les mesures existantes de sécurité et de santé au travail. (Convention 190 – Articles 9,11,12)

Quelle visibilité pour les travailleuses et comment sont-elles prises en compte dans la réponse au COVID-19 ? 

Comme nous le savons, les effets du Covid-19 sur l’économie mondiale sont appelés à s’inscrire dans la durée, et les groupes les plus vulnérables qui sont les premiers touchés seront également ceux pour qui les conséquences seront les plus sévères, y compris les femmes.

Grâce notamment aux travaux de la professeure Tessa Wright sur le genre et les industries à prédominance masculine, y compris les transports, nous savons que pour aboutir avec succès, toute stratégie visant à améliorer le statut des travailleuses nécessite que des actions positives en faveur des femmes soient intégrées aux démarches de diligence raisonnable et aux objectifs fondamentaux du projet, et doit pouvoir bénéficier d’opportunités particulières en termes de financement public et privé des infrastructures et services publics.

Alors que nous voguons au gré des vents de la pandémie, les gouvernements ont pour responsabilité essentielle de reconstruire l’économie. Dans le contexte des mesures de relance économique substantielles financées par des deniers publics et privés, il est essentiel que l’équité entre les femmes et les hommes fasse partie des principaux critères d’investissement. Le fonds de secours, les politiques économiques et les allocations chômage doivent tous être considérés sous le prisme du genre afin de véritablement inclure les femmes. Il est donc essentiel de veiller à ce qu’une perspective sexospécifique soit appliquée dans le cadre de la réponse au Covid-19, y compris au travers d’évaluations de l’impact selon le genre.

La recommandation n° 206 reconnaît l’importance des données. Elle invite les États à s’efforcer de collecter des données et de publier des statistiques sur la violence et le harcèlement dans le monde du travail, ventilées par sexe, par forme de violence et de harcèlement et par secteur d’activité économique, ainsi qu’en fonction des caractéristiques pour ce qui est des groupes en situation de vulnérabilité. La démarche est nécessaire afin d’informer et suivre les réponses politiques en vue de prévenir et de lutter contre la violence et le harcèlement dans le monde du travail (parag. 22 R206).

La Convention n° 190 fournit une feuille de route pour un environnement de travail juste et sûr et pour l’égalité de tous les travailleurs, des aspects essentiels pour assurer la pérennité des entreprises, dès lors que l’OIT souligne que « la violence et le harcèlement sont incompatibles avec la promotion d’entreprises durables et ont un impact négatif sur l’organisation du travail, les relations sur le lieu de travail, la motivation des travailleurs, la réputation de l’entreprise et la productivité » (préambule de la C190). Ce faisant, la Convention joue également un rôle essentiel pour la reconstruction de l’économie mondiale. 

Pour en savoir plus sur les revendications de l’ITF relatives aux droits des travailleuses des transports dans le cadre de la réponse à la crise du COVID-19, cliquez ici. 

La CSI a élaboré un certain nombre de supports, notamment :

  • Graphiques et GIF pour les réseaux sociaux
  • Foire aux questions
  • Mini-guide sur la C190
  • Exemple de lettre pour faire pression sur votre gouvernement

Tous ces supports sont disponibles à l’adresse :

https://www.ituc-csi.org/GBV

Pour en savoir plus sur la campagne de l’ITF en faveur de la C190, pour partager des informations relatives aux efforts déployés par votre syndicat ou votre gouvernement en vue de sa ratification, ou pour vous impliquer, écrivez-nous à women@itf.org.uk

El Convenio sobre la violencia y el acoso de la OIT y la crisis del COVID-19

El C190: Convenio sobre la violencia y el acoso, que promete un mundo del trabajo sin violencia ni acoso, fue adoptado en el año del centenario de la OIT, más concretamente, el 21 de junio de 2019. Este Convenio se logró en un momento en el que desconocíamos que atravesaríamos la pandemia de COVID-19, una crisis económica y sanitaria que está afectando seriamente nuestro mundo del trabajo.   La pandemia ha intensificado la discriminación y la violencia que ya existían en el mundo del trabajo. Los grupos marginados, minoritarios y otros grupos vulnerables —como los trabajadores y las trabajadoras informales y migrantes— están viéndose afectados de manera desproporcionada por el virus, lo que hace que este Convenio inclusivo sea un instrumento crucial para proteger los derechos de los trabajadores y las trabajadoras.

El Convenio 190 de la OIT aborda la violencia y el acoso, incluida la violencia de género, en el mundo del trabajo para todos los trabajadores y las trabajadoras.

El Convenio 190 es un instrumento creado para proteger y promover los derechos de todos los trabajadores contra la violencia y el acoso, incluida la violencia de género, durante esta crisis y en el futuro.El Convenio 190 es aplicable a todos los sectores, privados y públicos, a la economía formal y a la informal, en las zonas urbanas y en las rurales. (Artículo 2)

Dicho esto, es importante mencionar que las mujeres trabajadoras —que están sobrerrepresentadas en la economía informal, el trabajo precario y en puestos de trabajo en los que los niveles de segregación por motivos de género son elevados, en especial en sectores dominados por hombres como el transporte— están haciendo frente a consecuencias específicas y adicionales de la pandemia. A menudo trabajan en la primera línea en contacto directo con los clientes, como vendedoras de pasajes, tripulantes de cabina, personal de limpieza, revisoras y trabajadoras aeroportuarias con mayor vulnerabilidad a la violencia y a las repercusiones económicas y sanitarias durante la pandemia. 

Violencia y acoso en el mundo del trabajo 

Se ha producido un aumento a nivel mundial en la cantidad de incidentes y denuncias de violencia doméstica. Uno de los motivos es el cambio repentino de lugar físico de trabajo dado que muchos países se encuentran o se han encontrado en confinamiento total, lo que dejó a muchas sobrevivientes aisladas en sus hogares con sus abusadores.  

Al referirse a la causa del marcado aumento en la violencia doméstica durante la pandemia,Barb Macquarie, de la red DV@Work, afirma que: “El aislamiento ya es una táctica establecida de los agresores que ejercen violencia doméstica aun fuera del contexto de una pandemia”.

En un estudio nacional reciente llevado a cabo por sindicatos del transporte en la India, en el que 15 561 personas compartieron sus experiencias personales de violencia doméstica, una de las respuestas que más se escuchó fue: Mi lugar de trabajo era el único lugar que me mantenía cuerda y me ayudaba a sobrellevar las situaciones de violencia doméstica en casa”.

El Convenio 190 de la OIT reconoce que la violencia doméstica es un problema que afecta en el lugar de trabajo y afirma que los empleadores, los Gobiernos y los sindicatos deberán tomar las medidas correspondientes para reconocer y mitigar el impacto de la violencia doméstica en el mundo del trabajo. (C190 Preámbulo, Artículo 10(f), Recomendación – principio fundamental, III (18).

Acceda al sitio web de la red DV@Work aquí para saber cómo los empleadores pueden brindar apoyo a los trabajadores y las trabajadoras vulnerables a la violencia doméstica durante la pandemia. 

Mayor riesgo de violencia en el lugar de trabajo. Las mujeres ya estaban subrepresentadas en los sectores dominados por hombres y se encuentran aún más aisladas en sus lugares de trabajo durante esta pandemia debido a las considerables reducciones en la fuerza laboral —ya sea en forma temporaria o permanente— o por los cierres de fronteras que dejaron a millones de trabajadores y trabajadoras varados.

Por ejemplo: Hay más de 200 000 trabajadoras y trabajadores marítimos en todo el mundo cuyos contratos laborales a bordo de buques han terminado y que desean regresar a sus hogares, pero las restricciones de viaje y de circulación impuestas por los Gobiernos les han impedido hacerlo durante la pandemia de COVID-19. Este aislamiento durante tiempos de crisis ha aumentado la vulnerabilidad de las mujeres a la violencia en el lugar de trabajo.

Los mismos riesgos, junto con una mayor exposición al virus, existen para los trabajadores y las trabajadoras del transporte urbano que están en contacto con los clientes.  Las mujeres de color, las mujeres inmigrantes o las mujeres con discapacidad sufren una combinación de impactos. Puede citarse un ejemplo fatal en el que una trabajadora ferroviaria negra de Londres murió luego de que un hombre que afirmó estar infectado con el virus la escupiera mientras trabajaba.

El Convenio 190 de la OIT se aplica a la violencia y el acoso en el mundo del trabajo que ocurren durante el trabajo, en relación con el trabajo o como resultado del mismo. Esto incluye en los trayectos entre el domicilio y el lugar de trabajo y en el alojamiento proporcionado por el empleador (Artículo 3 (a), (e), (f)). Asimismo, provee a los trabajadores y trabajadoras los recursos necesarios para abordar una crisis en el lugar de trabajo en el marco de la violencia y el acoso.

El mundo del trabajo se redefine todos los días 

Las comunicaciones relacionadas con el trabajo, a través de las tecnologías de la información y la comunicación —que ya forman parte de nuestro mundo laboral— han aumentado debido a la pandemia. Hay un rápido cambio en las formas de trabajar, con la incorporación de reuniones en línea, digitalización y oficinas virtuales, para adaptarse a los desafíos del trabajo remoto durante la pandemia. En estas nuevas modalidades de trabajo, existe un riesgo mayor de acoso y violencia, incluidos el ciberacoso y el trolling.

El Convenio 190 incluye la violencia y el acoso en el mundo del trabajo que ocurren durante el trabajo, en relación con el trabajo o como resultado del mismo en el marco de las comunicaciones que estén relacionadas con el trabajo, incluidas las realizadas por medio de tecnologías de la información y de la comunicación (Convenio 190, Artículo 3 d).

Salud y seguridad ocupacional

Debido a la segregación de género en la industria del transporte, las mujeres se concentran en la primera línea de lucha contra esta pandemia realizando funciones de limpieza y atención al cliente, donde corren un mayor riesgo de infección y de sufrir efectos psicológicos adversos. Esta mayor exposición, combinada con la falta de equipos de protección individual (EPI) adecuados y de apoyo psicológico para procesar la ansiedad de los clientes, los riesgos mortales en el lugar de trabajo, el mayor estrés que sufren en casa a causa del riesgo que supone para la familia, y combinada también con el hecho de que las mujeres ocupan la mayoría de los empleos precarios, aboca a las mujeres que trabajan en el transporte a sufrir de manera desproporcionada los efectos negativos de la crisis del coronavirus.

Nos faltan EPI y tememos llevar el virus a nuestras casas, por eso intentamos que los niños y niñas no se nos acerquen. A pesar de estos retos, nos sentimos orgullosas de desempeñar un papel importante manteniendo los espacios limpios para todo el mundo”. Trabajadora ferroviaria, India

El Convenio 190 reconoce la violencia y el acoso así como los riesgos psicosociales asociados como riesgos a la salud y la seguridad y establece que los Gobiernos deberán tomar medidas en consulta con las organizaciones representativas de los empleadores y de los trabajadores a fin de garantizar que la violencia y el acoso se incorporen a las políticas nacionales pertinentes, incluidas aquellas que amplían o adaptan medidas de seguridad y salud en el trabajo existentes. (Convenio 190 – Artículo 9, 11, 12)

Visibilidad de las mujeres trabajadoras e inclusión en la respuesta al COVID-19  

Como sabemos, el COVID-19 tendrá un impacto de largo plazo en la economía mundial, y los grupos más vulnerables que se ven afectados en primer lugar también serán los grupos afectados en mayor medida, incluidas las mujeres.

A partir de la investigación de la Profesora Tessa Wright sobre género e industrias dominadas por hombres como la del transporte, sabemos que las estrategias para mejorar la condición de las mujeres trabajadoras tienen éxito cuando la acción positiva en cuestiones de género forma parte de los objetivos centrales de los proyectos y la diligencia debida, con oportunidades particulares en términos de financiamiento público y privado destinado a infraestructura pública y prestación de servicios

Mientras transitamos la pandemia, los Gobiernos tienen una responsabilidad esencial en la reconstrucción de la economía.  Con estímulos económicos importantes a través de fondos públicos y privados, resulta fundamental que se incorpore la justicia de género a los criterios centrales de inversión. Los fondos de asistencia, las políticas económicas y las prestaciones por desempleo deben ser considerados con un enfoque de género para que sean verdaderamente inclusivos. Por lo tanto, resulta esencial asegurar que se aplique una perspectiva de género a la respuesta al COVID-19 que incluya evaluaciones del impacto de género.

La Recomendación 206 reconoce la importancia de los datos. Convoca a los Estados a recopilar datos y publicar estadísticas desglosados por sexo, por forma de violencia y acoso y por sector de actividad económica, así como por las características de los grupos en situación de vulnerabilidad. Esto es necesario para informar y monitorear las respuestas en materia de política dirigidas a prevenir y abordar la violencia y el acoso en el mundo del trabajo  (Párr. 22 R206).

El Convenio 190 proporciona una hoja de ruta para un ambiente de trabajo justo y seguro e igualdad para todos los trabajadores y trabajadoras, lo cual es fundamental para la sostenibilidad de las empresas, tal como resalta la OIT: “La violencia y el acoso son incompatibles con la promoción de empresas sostenibles y afectan negativamente a la organización del trabajo, las relaciones en el lugar de trabajo, el compromiso de los trabajadores, la reputación de las empresas y la productividad” (Convención 190 – Preámbulo). Por lo tanto, el Convenio también es fundamental para reconstruir la economía mundial. 

Para más información acerca de las reivindicaciones de la ITF en relación con los derechos de las trabajadoras del transporte y el COVID-19, haga clic aquí.

La CSI ha elaborado una serie de materiales, a saber:

  • Gráficos y GIFs para las redes sociales
  • Preguntas frecuentes
  • Miniguía del Convenio 190
  • Modelo de carta para presionar a los Gobiernos

Todo el material está disponible en:

https://www.ituc-csi.org/GBV?lang=es

Para obtener más detalles sobre la Campaña de la ITF en relación con el Convenio 190, compartir información sobre acciones de ratificación por parte de su sindicato o su Gobierno o participar activamente, escríbanos a women@itf.org.uk

ILO Violence and Harassment Convention and the COVID-19 crisis

C190 – Violence and Harassment Convention that promises a world of work that is free of violence and harassment came into existence during the ILO centenary year, on June 21st 2019.

This Convention was won when we did not know that we would be living through COVID 19 – a health and economic crisis that is severely impacting our world of work.   The Pandemic has intensified the already existing discrimination and violence in the world of work. The marginalised, minority and other vulnerable groups including informal and migrant workers are facing disproportionate impacts of the virus, making this inclusive Convention a crucial instrument to protect workers rights.

ILO Convention 190 addresses violence and harassment including gender-based violence in the world of work for all workers.

Convention 190 is an instrument to protect and promote rights of all workers against violence and harassment including gender based violence, during this crisis and beyond.

The convention 190 applies to all sectors, whether private or public, both in the formal and informal economy, and whether in urban or rural areas. (Article 2)

Having said that, it’s important to note that women workers – who are over-represented in the informal economy, precarious work, and in gender-segregated roles, especially in male-dominated sectors like transport – are facing specific and additional impacts of the pandemic. They are often working in the frontline in customer-facing roles like ticket sellers, cabin crew, cleaners, conductors and airport workers with increased vulnerability to violence, health and economic impacts during the Pandemic. 

Violence and harassment in the world of work 

There has been a global surge in domestic violence incidents and reports. One of the reasons being the overnight change of physical workplace as many countries are/have been in complete lockdown, leaving many survivors isolated in their homes with their abuser.  

Addressing the cause of the dramatic increase in domestic violence during the pandemic, Barb Macquarie from the DV@Work network states that  ‘Isolation is already an established tactic of domestic violence abusers even outside of a pandemic context’

According to a recent national study led by transport unions in India, in which 15,561 people shared their personal experiences of domestic violence, a response that resonated throughout was my workplace was the only place that kept me sane and helped me cope when I was facing domestic violence at home’.

ILO Convention 190 recognises domestic violence as a workplace issue, and states that employers, governments and unions shall take appropriate measures to recognise and mitigate the impacts of domestic violence in the world of work. (C190 Preamble, Article 10(f), Recommendation core principle, III(18).

Read here how employers can extend support to workers vulnerable to domestic violence during the Pandemic, on DV@Work network website. 

Increased risk of violence at workplace Women were already under-represented in male dominated sectors and are further isolated in their workplace during this Pandemic due to massive reductions in labour force participation – temporary or permanent – or through border closures leaving millions of workers stranded.

For example – More than 200,000 seafarers including women who have finished their contracts aboard the world’s ships and they want to go home. Government restrictions on travel and transit have prevented them from doing so during the Covid-19 pandemic.  This isolation during time of crisis has  increased the vulnerability to violence in the workplace for women.

The same risks, along with increased exposure to the virus, exist for customer-facing workers in urban transport.  For women of color, immigrant women or women with disabilities there are intersecting impacts, one fatal example happened when a black women railway worker in London died after being spat on at work by a man who said he had the virus.

ILO Convention 190 applies to violence and harassment in the world of work occurring in the course of, linked with or arising out of work.  This includes the commute to and from work and  employer-provided accommodation. Article  3 (a), (e), (f), and equips the workers to address a workplace crisis like this in the framework of Violence and harassment.

The world of work is being redefined every day 

Work-related communications, through information and communication technologies – already part of our world of work – has increased because of the Pandemic.  There is a rapid shift in ways of working including online meetings, digitalisation/e-offices, to adapt to the challenges of remote working during the Pandemic. There is an increased risk of harassment and violence in these new ways of working including cyber bullying and trolling.

C190 includes violence and harassment in the world of work occurring in the course of, linked with or arising out of work including in work-related communications, including those enabled by information and communication technologies; (Convention 190, Article 3 d)

Occupational health and safety As a result of the gender-segregated nature of the transport industry, women are concentrated on the frontlines of this pandemic in customer-facing and cleaning roles with a higher risk of infection and psychological impacts. This increased exposure, combined with a lack of adequate and appropriate personal protective equipment (PPE) and no psychological support to process the experiences of customer anxiety, fatal risks at workplace, increased stress at home due to risk to the family, and the fact that women also make up the majority of precarious workers, means that women transport workers will disproportionately suffer the negative impacts of the coronavirus crisis.

We are lacking PPE kits and fear carrying the virus home, so we try to keep our children away from us. Even with these challenges, we feel proud to play an important role maintaining cleanliness for everyone.” – Railway worker, India

Convention C190 recognises violence and harassment and associated psychosocial risks as health and safety risk and states that steps should be taken by governments in consultation with representative employers’ and workers’ organisations, to ensure that violence & harassment  are integrated in relevant national policies, including by extending or adapting existing occupational safety and health measures. (Convention 190 – Article 9,11,12)

Visibility of women workers and inclusion in the COVID-19 response 

As we know COVID-19 will have a long-term impact on the global economy, and the most vulnerable groups that are being affected first, will also be the groups that will be affected most, including women.

Backed by research by Professor Tessa Wright on gender and male-dominated industries including transport, we know that strategies for improving the status of women workers succeed when positive gender action forms part of core project objectives and due diligence, with particular opportunities linked to public finance, and private finance for public infrastructure and service delivery.

As we navigate through pandemic, governments have essential responsibility in rebuilding the economy.  With substantial economic stimulus through public and private funds, it’s vital that gender justice is integrated within core investment criteria. The relief fund, economic policies, unemployment benefits need to be informed through the gender lens to make it truly inclusive. Thus it’s critical to ensure a gender lens is applied to COVID-19 response including through gender impact assessments.

Recommendation No. 206 recognises the importance of data. It calls upon states to make efforts to collect and publish statistics disaggregated by sex, forms of violence and harassment, and sector of economic activity, as well as by characteristics of groups in vulnerable situations. This is necessary to inform and monitor policy responses to prevent and address violence and harassment in the world of work (Para. 22 R206).

The Convention 190 provides a roadmap for a just, safe work environment and equality for all workers, which is critical for sustainability of businesses as the ILO highlights ‘violence and harassment is incompatible with the promotion of sustainable enterprises and impacts negatively on the organisation of work, workplace relations, worker engagement, enterprise reputation, and productivity’ (Convention 190 Preamble). Thus the Convention is also central to rebuilding the global economy. 

Find more about the ITF demand for Women transport workers’ rights and COVID-19 here.  

The ITUC has  produced a number of materials including:

  • Social media graphics and GIFs
  • FAQs
  • Mini guide to C190
  • Sample letter for lobbying governments

All the material are available at:

https://www.ituc-csi.org/GBV

To know more about ITF C190 Campaign, to share information about ratification action by your union or government, or to get involved, write to us at women@itf.org.uk 

‘Domestic Violence and the Workplace: A Qualitative Study with Men’

Domestic violence and the workplace

When workers are experiencing or engaging in violence at home, the impact is felt in the workplace. Historically, workplace policies on violence and harassment have been limited to workplace issues, however with global evidential studies and new policies, including ILO Convention 190 (on violence and harassment in the world of work), domestic violence is increasingly recognised as a workplace issue, as it impacts not only individuals and families, but also communities and society as a whole. When workers are experiencing or engaging in domestic violence, its impacts resonate in the workplace – affecting employment, productivity, and health and safety.

In 2019, the ITF conducted a qualitative study with male perpetrators of domestic violence in the state of Maharashtra, India – working with the Pune based NGO SAMYAK (Samyak is a Communication and Resource Centre on gender, masculinities, health and development) – to understand how work is impacted by domestic violence. This is the first ever study in Asia/Pacific that highlights the link between domestic violence and its impact at work. The study had its own set of challenges and constraints because of the sensitivity of the issue.

Alongside this study, unions in India, with support from the ITF, are leading a national study on understanding the impacts of domestic violence at work from a survivor’s perspective.  Read more here about this groundbreaking study.  Email  women@itf.org.uk to find out more about research on domestic violence at work.

A full report of this qualitative study with men will be available soon!

Some of the key findings from the study are:

1. Male respondents feel pressurised by patriarchal social norms to ‘perform’ control over women and children in their family.

“….. my grandfather and my father did control women in our family… I feel that I also need to control my wife to maintain the tradition and keep our family intact”.

2. Male respondents justify their actions of domestic violence, power and control.  Almost all respondents agreed with the statement that ‘men should control their wives’ and gave various reasons for their entitlement to this behaviour.

“If man is under stress, he commits violence. If woman does any mistake in household work then it’s okay to beat her”.

“It is a family… such incidences are going to happen…not a big deal. A man can slap his wife if she does any mistake”.

Text Box: Almost all male respondents agreed with the statement that ‘men should control their wives’.

“It is a family… such incidences are going to happen…not a big deal. A man can slap his wife if she does any mistake”.

3. Male respondents associate domestic violence with physical and verbal forms of abuse and do not recognize emotional abuse, economic abuse, sexual abuse or coercively controlling behavior as forms of violence.

“There is only one reason behind violence and that is sex.  Wife is not our enemy.  Everyone uses their wife for having sex.  If you ask her for sex and she refuse it then what can we do?  We are men, we give all things to her, give bread to her, then she should satisfy us.  Otherwise what reason we have wife?”.

4. Male respondents are negatively affected at work by their perpetration of domestic violence.  Stories shared by respondents show that engaging in domestic violence has a range of mild to severe consequences for their work performance and productivity at the workplace.

“I got suspended because of the negligence on the duty, as I was mentally disturbed due to violence committed by me against my wife I was sent on mandatory leave.”

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“I prefer not to go on duty when I am not in good mental condition. I have to face the consequences of that. My seniors report against me. It has happened 2-3 times before and now I prefer to stay at home instead of risking the life of people”.

5. Workplace accidents caused by male respondents impacted by their perpetration of domestic violence, put the safety of passengers and fellow employees at risk and are a significant cost to the employer.

“As I committed domestic violence against my spouse, I dashed my bus against a car…”

Text Box: …absenteeism, poor performances, distraction at work, accidents at work - are the cost of domestic violence that are paid by employer.

“It impacts on my driving, if I have some family tension that I do mistakes while driving. It goes wrong. Can’t concentrate in work in such situation…. Nothing else”.

“I can’t concentrate at work. Once I met an accident while there were passengers on board. Me and passenger got injured in that accident.”

“I had a fight with my mother before leaving home. I went to work but forgot to check the vehicle. I directly started it. There were many passengers on board. Later I realized that the breaks of that bus vehicle were not working properly. I got so tensed but somehow, I managed to stop the vehicle and no injury happened to the passengers. But in that incidence a road side lamb died under the vehicle”.

6. Male respondents need a safe space at work to share their problems, talk about their experiences and seek professional counselling support. The majority of respondents shared that they prefer not to talk about their stress with anyone and prefer to deal with it at a personal level.  However, if provided with an appropriate service, they would be willing to seek professional counselling support at the workplace. They had the opinion that such support at the workplace might help reduce their engagement in domestic violence, reduce stress and create a more productive and safe work environment.

“Availability of counseling facility at the workplace will help me to manage the stress. It may also help me control my violent behaviours at home.”

“There is no help available. I have no option but to stay calm”.

“There are not such facilities available at workplace. I talk with my colleagues about my problems and nothing else”.

Domestic Violence and the World of Work

Domestic violence is increasingly recognised as an issue that impacts not only individuals and families, but also communities and society as a whole. When workers are involved in or affected by domestic violence, its impacts resonate in the workplace – affecting employment, productivity, and health and safety.

Women are at a higher risk of losing their job when they are facing domestic violence, as it can directly impact on their work, which further compounds their vulnerability. In some cases, domestic violence can follow them to work. It enters the workplace in a range of ways – from harassment and violence happening at work (by co-workers or external perpetrators), stress on co-workers, to death in the workplace for workers and others.

“Living with abuse at home is so terrifying. But when I became viewed as a bad employee and (my) job changed, then I had to leave and move away, nothing in (my) life felt safe anymore.” – Woman worker facing domestic violence

On the other hand, being employed is a key pathway to leaving a violent relationship. The financial security that employment affords can allow women to escape the isolation of an abusive relationship, and maintain, as far as possible, their home and standard of living, both for themselves, and their children. The workplace provides positive opportunities to disrupt domestic violence, keep women safe and support them to live lives free of violence.

Domestic violence also has a significant economic cost to work, as established by the outcomes of national studies on domestic violence at work conducted in 10 countries globally

“I was thinking about the relationship. I didn’t have my mind on what I was doing driving an 18000-pound forklift. I spilled one of the bumps of lumber and it broke open. I had to do a lot more work to put it back (and) wasted (a lot of) time.” – Male worker engaging in domestic violence 

National domestic violence at work studies

Globally, employers and governments for the longest time have not recognized the link between domestic violence and the workplace.

However, labour unions have been playing an important role in breaking the culture of silence. Since 2011, 10 countries around the world, including countries in South Asia, have conducted large–scale national studies on domestic violence in the workplace.

These national studies have revealed consistent outcomes, and the results show the  impacts of domestic violence in the workplace. The studies conducted in these countries have been catalysts for policy reforms.

Why unions are conducting a national study in India

The transport unions in India have recognised the need and potential for advocacy work on the issue of domestic violence and setting employer accountability to address the impacts, however, there is a lack of evidence and data in India on this issue.  The national study being conducted by transport unions, which was launched in November 2019, is the first study in India that will highlight the links between domestic violence and its impact in the world of work.

If policies are not gender sensitive and inclusive, there is grave danger that levels of domestic violence will worsen and women’s participation in the workforce will decrease. Against a backdrop of worsening violence against women in the country, it’s the apt time to bridge the data gap on domestic violence and its impacts on the workplace and to reform policies.

The new ILO Convention 190 on the elimination of violence and harassment in the world of work recognises domestic violence as a workplace issue – noting that it “can affect employment, productivity and health and safety, and that governments, employers’ and workers’ organisations and labour market institutions can help, as part of other measures, to recognise, respond to and address the impacts of domestic violence.”

The national study will therefore also create a foundation for lobbying the government to ratify ILO Convention 190.

Trade unions in India are calling for support across sectors to conduct this national study, and from the results to shape an advocacy campaign and to lobby the government for legal reforms, including ratification of the ILO Violence and Harassment Convention, 2019 (No. 190).  

To find out more email: women@itf.org.uk

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